5. अमावस्या की रात उसे किसी ने नहीं बुलाया था ...

अमावस्या की रात उसे किसी ने नहीं बुलाया था ...

सितारों की महफ़िल में चाँद को बुलावा आया था, 
फ़िर भी ना जाने क्यों उसका आँख भर आया था, 
चाँदनी रात में तन्हा भी वह बहुत ख़ुश था, 
अमावस्या की रात उसे किसी ने नहीं बुलाया था...

महफ़िल की अंदाजे बयां कुछ इस कदर सिर चढ़ कर बोल रही थी, 
हर दिल-अजीज अपने शान-शौकत से दूसरे के आबरू को तौल रही थी, 
चाँद को यह खुशनुमा महफ़िल बिल्कुल भी रास नहीं आया था, 
अमावस्या की रात किसी ने उसे नहीं बुलाया था ...

अचानक हीं चाँद के दिल में यह  ख्याल आया था, 
इन्हीं सितारों ने हीं उसे बहुत रुलाया था, 
वक्त ने चाँदनी रात फ़िर से ख़ूबसूरत बनाया था, 
अमावस्या की रात उसे किसी ने नहीं बुलाया था...

सितारों के बीच उसने अपने अस्तित्त्व को विलुप्त पाया था, 
उसके जख्मों पर मरहम लगाने तब कोई नहीं आया था, 
जख्मों से ज्यादा इसी तन्हाई ने उसे रुलाया था, 
अमावस्या की रात उसे किसी ने नहीं बुलाया था ...

सितारों ने चाँद का इजहार कर अपनी क़िस्मत पर इतराया था, 
चाँद के आने से महफ़िल में कुछ ऐसा हीं रौनक आया था, 
वक्त ने उसे आज एक बार फ़िर बहुत रुलाया था, 
अमावस्या की रात उसे किसी ने नहीं बुलाया था...

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